दश्त -ए -तनहाई में जीते हुए
ये ज़िन्दगी बिताई हमने
इतना अरसा गुज़ारा है तनहा हमने
के तेरी सोहबत में अपनी आदतों का टूटना
दिल के किसी कोने में टूटे कांच सा चुभता है
मुख़ालिफ़ ताक़तों से लड़ना अब लगता है आसां
तुम्हें रखना ज़हन में हो रहा हर पल को दूभर
मैं ज़ख़्मी जानवर सा बिलबिलाया भागता हूँ
कदम टिकना नहीं हैं चाहते अब तो कहीं पर
यकीन करना लोगों पर जिसे याद नहीं
उसी से चाहो के तुम्हारा इत्तेमाद करे
के आज चाह कर भी तुझको मैं न चाह सकूं
वक़्त की फितरत को लगता है
है मंज़ूर यही
















